मंगलवार, 5 जुलाई 2011

तेलंगाना कि मांग...

देश में एक बार फिर से एक नया राज्य बनाने का मामला तूल पकड़ने लगा है. वैसे तेलंगाना मुद्दा कई दशको से आंध्र प्रदेश कि राजनीति में गरमाया हुआ है. सरकार किसी भी दल कि रही हो किसी ने भी इस समस्या का हल नहीं निकला है. बेहतर निर्णय नहीं लेने कि वजह से ही आंध्र प्रदेश कि राजनीति इस मोड़ पर पहुँच गई है. आंध्र प्रदेश में सत्तारुड कांग्रेस पार्टी के ही ११ मंत्रियो और ८६ विधायकों ने इस्तीफे दे दिए है. अपने इस्तीफे सीधे विधानसभ अध्यक्ष को देकर इन लोगो ने ये तो साबित कर ही दिया है कि ये सब महज ड्रामा नहीं है, बल्कि वे तेलंगाना मुद्दे पर गंभीर हैं. ये मुद्दा वैसे भी आंध्र प्रदेश कि राजनीति में नया नहीं है. दशकों से अपना राजनीतिक हित देखते हुए हर सत्तारुड दल इस मामले में चुप्पी साधे हुए है.
वैसे, मामला अलग राज्य के समर्थन या विरोध का नहीं है, बल्कि राजनीतिक ढील का है. सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी भी इसके ज़िम्मेदार हैं. राजनेता तो वैसे भी हर मुद्दे पर सिर्फ राजनीति ही कर सकते हैं, लेकिन नौकरशाही को तो कम से कम सही स्थिति सामने लानी चाहिए. अगर वे ही सजग होकर को साफ करेंगे और अपनी ठोस राय सरकार के सामने रखेंगे तो शायद सरकार भी इस मसले को टाल ना सके.
बेहतर तो यही होगा कि भारत सरकार इस मुद्दे पर जल्द ही कोई फैसला ले. वरना फिर कोई नेता अनशन करेगा तो कोई इस्तीफा देगा. वैसे इस बार के इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए तो परेशनी राज्य सरकार के लिए ही खड़ी होगी. हालात काबू से बाहर गए तो यहाँ राष्टपति शाषण भी लगाया जा सकता है. ऐसे में समस्या हल नहीं तलाशा गया तो स्थिति ओर भी भयावह होगी. ऐसे में उचित यही होगा कि एक अलग राज्य बनाकर उसके विकास को गति दी जाए.

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