रविवार, 26 जून 2011

'छोड़ आये हम वो गलियां ...''

मिस यू जयपुर.
आज तुम बहुत याद आ रहे हो. किसी खास से बातो-बातो में तुम्हारा ज़िक्र चल पड़ा और फिर क्या था पुरानी यादे ताजा हो उठी. वो कॉलेज कि मस्ती, वो दोस्तों का साथ, वो राजापार्क के गोलगप्पे, वो बापू बाज़ार कि शौपिंग. बिरला मंदिर में वक़्त गुजरना, गौरव टोवएर में घूमना. वो पल भी क्या पल थे, अब तो बस यादें बची हैं. किसी ने सच ही कहा है कि आप दुनिया के किसी भी कौने में भले ही चले जाओ पर अपनी मिटटी तो अपनी ही होती है.
उस शहर से ऐसी यादें जुडी हैं जो भूले नहीं भुलाई जाती. वक़्त गुजर गया, लेकिन यादें आज भी उतनी ही ताजा है. काश वो पुराने दिन फिर से लौट आये. घर कि छत पर खड़े होकर नाहरगढ़ के किले को निहारना मुझे बहुत पसंद था. वहा से डूबता हुआ सूरज बहुत कुछ कह जाता था. शाम को ऑफिस से घर लौटने के बाद जब खाली होती थी तो आसमान को निहारती हुई सोचती थी कि क्या कभी में उन बुलंदियों को छु पाऊँगी जो कि मेरा सपना है.... लेकिन सपना तो सपना ही रह गया.
अब एक बार फिर से उन्ही सपनों में रंग भरने कि प्रेरणा मिली है. लगता है किसी कि उम्मीदों को पूरा करने का समय आ गया है. अगर उस प्रेरणादायक इन्सान का साथ रहा तो शायद अब मंजिल दूर नहीं है.

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